मंगलवार, 20 अप्रैल 2010


बचपन के दुःख भी कितने अच्छे थे ,

तब तो सिर्फ खिलोने टुटा करते थे ,

वो खुशियाँ भी ना जाने कैसी खुशियाँ थी ,

तितली को पकड़ के उछला करते थे ,

पांव मारके खुद बारिश में अपने आप को भिगोया करते थे ,

अब तो एक आंसू भी रुसवा कर जाता है ,

बचपन में तो दिल खोल कर रोया करते थे

कोई टिप्पणी नहीं: