बुधवार, 15 सितंबर 2010

भोर की पहली किरण


भोर की पहली किरण से
सारा नभ फिर जी उठा ,
करने लगे गान पंछी और
उपवन महक उठा,
सूर्य के पहले प्रकाश में ,
स्रष्टि ने ली अंगड़ाई ,
रवि को जगता देख कर
स्याह रजनी घबराई ,
रात्रि की इस घबराहट में
चाँद की सिमटी छटा,
और तारो की बारात ने
ली हमसे फिर विदा ,
ओस चमकी मोतियों सी
फूलो ने बिखेरी फिर छटा ,
और स्रष्टि चक्र फिर से
एक कदम आगे बढ़ा
             -- प्रतिभा शर्मा
         

2 टिप्‍पणियां:

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

आपकी इस रचना को पढ़कर बहुत अच्छा लगा ,,,,,,,,!!! बहुत सुन्दर !!!

अथाह...

कुछ ऐसा ही मैंने भी लिखा था ,आप भी पढ़े ,मुझे बहुत अधिक प्रसन्नता होगी

एक अनंत सत्य की तरह

शारदा अरोरा ने कहा…

सुन्दर लिखा है , धीरे धीरे लेखन और चमक जाएगा , लिखती रहिये ।